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वेदों में परिवर्तन क्यों नहीं हो सकता ??

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 वेदों में परिवर्तन क्यों नहीं हो सकता??? वेदों में परिवर्तन क्यों नहीं हो सकता? (युगों से वेदों की अपरिवर्तनशीलता कैसे सुनिश्चित है, यह जानने के लिए ध्यानपूर्वक इस लेख को पढ़ें | हम उन अनेक विद्वानों के आभारी  हैं, जिनके मूल स्त्रोत तो अज्ञात हैं परन्तु जिनके ज्ञान को इस लेख में प्रयुक्त किया गया है|)  वेदों को उनकी आरंभिक अवस्था में कैसे संरक्षित किया गया, इस पर यहाँ कुछ विश्लेषणात्मक और निष्पक्ष सुझाव प्रस्तुत किये गए हैं | वेदों को  अपने विशुद्ध स्वरुप में बनाये रखने और उनमें किंचित भी फेर बदल की संभावना न  होने के कारणों को हम यहाँ विस्तार से देखेंगे |  विश्व का अन्य कोई भी मूलग्रंथ संरक्षण की इतनी सुरक्षित पद्धति का दावा नहीं कर सकता है |  हमारे पूर्वजों (ऋषियों )  ने विभिन्न प्रकार से वेद मन्त्रों को स्मरण करने की विधियाँ अविष्कृत कीं, जिनसे वेदमन्त्रों की स्वर-संगत और उच्चारण का रक्षण भी हुआ | वेदों  का  स्वर-रक्षण हमारे पूर्वजों ने नियमों के आधार पर यह सुनिश्चित किया कि मंत्र का गान करते हुए एक भी अक्षर, मात्रा या स्वर में फेरबद...

मूर्ति पूजा वेद विरुद्ध - आर्यवीर राणा

क्या मूर्तिपूजा वेद-विरुद्ध है? भारत में मूर्ति-पूजा जैनियों ने लगभग तीन हजार वर्ष पूर्व से अपनी मूर्खता से चलाई । जिससे उस समय तो आदि शंकरचार्य ने निजात दिला दी परंतु उनके मरते ही उनको भी शिव का अवतार ठहरा कर पेट-पूजा होने लगी । इसी मूर्ति-पूजा के कारण ही भारत में क्रूर इस्लाम  की स्थापना हुई तथा भारत को परतंत्रता का मुँह देखकर अवनति के गर्त में गिरना पड़ा । अब भी यदि इस्लाम से बचना चाहते हो , मुसलमानों , इसाइयों से दुनिया को बचाना चाहते हो तो श्री राम , श्री कृष्ण के सदृश्य आर्य ( श्रेष्ठ ) बनों । सृष्टि की सबसे पुरानी पुस्तक वेद में एक निराकार ईश्वर की उपासना का ही विधान है, चारों वेदों के 20589 मंत्रों में कोई ऐसा मंत्र नहीं है जो मूर्ति पूजा का पक्षधर हो । महर्षि दयानन्द के शब्दों में – मूर्ति-पूजा वैसे है जैसे एक चक्रवर्ती राजा को पूरे राज्य का स्वामी न मानकर एक छोटी सी झोपड़ी का स्वामी मानना ।                                               ...

जाओ अपनी माँ से पूछ कर आओ

🌺जाओ, अपनी माँ से पूछकर आओ🌺 देश-विभाजन से बहुत पहले की बात है, देहली में आर्यसमाज का पौराणिकों से एक ऐतिहासिक शास्त्रार्थ हुआ। विषय था- ‘अस्पृश्यता धर्मविरुद्ध है-अमानवीय कर्म है।’ पौराणिकों का पक्ष स्पष्ट ही है। वे छूतछात के पक्ष पोषक थे। आर्यसमाज की ओर से पण्डित श्री रामचन्द्रजी देहलवी ने वैदिक पक्ष रखा। पौराणिकों की ओर से माधवाचार्यजी ने छूआछात के पक्ष में जो कुछ वह कह सकते थे, कहा। माधवाचार्यजी ने शास्त्रार्थ करते हुए एक विचित्र अभिनय करते हुए अपने लिंग पर लड्डू रखकर कहा, आर्यसमाज छूआछात को नहीं मानता तो इस अछूत (लिंग) पर रखे  इस लड्डू को उठाक खाइए। इस पर तार्किक शिरोमणि पण्डित रामचन्द्र जी देहलवी ने कहा, ‘‘चाहे तुम इस अछूत पर लड्डू रखो और चाहे इस ब्राह्मण (मुख की ओर संकेत करते हुए कहा) पर, मैं लड्डू नहीं खाऊँगा, परन्तु एक बात बताएँ। जाकर अपनी माँ से पूछकर आओ कि तुम इसी अछूत (लिंग) से जन्मे हो अथवा इस ब्राह्मण (मुख) से?’’ पण्डित रामचन्द्रजी देहलवी की इस मौलिक युक्ति को सुनकर श्रोता मन्त्र-मुग्ध हो गये। आर्यसमाज का जय-जयकार हुआ। पोंगा पंथियों को लुकने-छिपन...

माँसाहार,, आर्यवीर राणा

🌻🍀ओ३म्🌻🍀 🌻मांसाहार:- महर्षि दयानन्द कहते हैं कि-वृक्षों के अत्यन्त अन्धकार(तमोगुणी) महा सुषुप्ति,महान नशे में होने से भक्ष्या-भक्ष्य,पाप-पुण्य,हिंसा-अहिंसा से होने वाली पीड़ा उन्हें नहीं होती इसलिए उन्हें काटने से हिंसा नहीं होती,वेद ने वृक्षों के फलों को तथा साग-भाजी,कन्द-मूल आदि को भक्ष्य बताया है अतः उनके खाने में कोई पाप नहीं। क्या वृक्ष वनस्पतियों में जीव है?परमात्मा की निर्माण की हुई वनस्पतियों में जीव तो है परन्तु वह सुषुप्ति अवस्था में है।कहा भी जाता है कि घोर अत्याचारी,दुराचारी,व्यभिचारियों को परमात्मा जो उनके कर्मों का फल देता है,वह फल उन्हें सुषुप्ति अवस्था में भोगनि पड़ता है।यह योनिया़ अन्धकारमय हैं। जीव सृष्टि के देखने से पता चलता है कि जीव अपने शरीर को भीतर से बढ़ाता है और मनुष्य की कृतियां बाहर से बढ़ती हैं।अतः वृक्ष-वनस्पतियां जो भीतर से बढ़ती हैं,वे जीव तो धारण करती हैं किन्तु इन योनियों के जीवों को सुख-दुःख की अनुभूति नहीं होती।वनस्पति को शरीर नहीं होता। शरीर उसे कहते हैं जिससू जीव इन्द्रियों की चेष्टा करता है जैसा कि गौतम ऋषि के न्यायदर्शन १/१/११ मे...

शंका समाधान - 33 करोड़ देवता ??

: वेदों में वर्णित विभिन्न देवताओं या ईश्वरों के बारे में आप क्या कहेंगे ? 33 करोड़ देवताओं के बारे में क्या? उत्तर: 1. जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है जो पदार्थ हमारे लिए उपयोगी होते हैं वो देवता कहलाते हैं । लेकिन वेदों में ऐसा कहीं नहीं कहा गया कि हमे उनकी उपासना करनी चाहिए । ईश्वर देवताओं का भी देवता है और इसीलिए वह महादेव कहलाता है , सिर्फ और सिर्फ उसी की ही उपासना करनी चाहिए । 2. वेदों में 33 कोटि का अर्थ 33 करोड़ नहीं बल्कि 33 प्रकार (संस्कृत में कोटि शब्द का अर्थ प्रकार होता है) के देवता हैं । और ये शतपथ ब्राह्मण में बहुत ही स्पष्टतः वर्णित किये गए हैं, जो कि इस प्रकार है : 8 वसु (पृथ्वी, जल, वायु , अग्नि, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र ), जिनमे सारा संसार निवास करता है । 10 जीवनी शक्तियां अर्थात प्राण (प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त , धनञ्जय ), ये तथा 1 जीव ये ग्यारह रूद्र कहलाते हैं 12 आदित्य अर्थात वर्ष के 12 महीने 1 विद्युत् जो कि हमारे लिए अत्यधिक उपयोगी है 1 यज्ञ अर्थात मनुष्यों के द्वारा निरंतर किये जाने वाले निस्वार्थ कर्म । शतपथ ब्रा...

भगत सिंह

उसे यह फ़िक्र है हरदम उसे यह फ़िक्र है हरदम, नया तर्ज़े-जफ़ा क्या है? हमें यह शौक देखें, सितम की इंतहा क्या है? दहर से क्यों खफ़ा रहें, चर्ख का क्यों गिला करें, सारा जहाँ अदू सही, आओ मुकाबिला करें। कोई दम का मेहमान हूँ, ए-अहले-महफ़िल, चरागे सहर हूँ, बुझा चाहता हूँ। मेरी हवाओं में रहेगी, ख़यालों की बिजली, यह मुश्त-ए-ख़ाक है फ़ानी, रहे रहे न रहे। 🌺🌺🌺🌺🌺 भगत सिंह ( मार्च १९३१) 🌺🌺🌺🌺🌺