भगत सिंह

उसे यह फ़िक्र है हरदम

उसे यह फ़िक्र है हरदम,

नया तर्ज़े-जफ़ा क्या है?
हमें यह शौक देखें,

सितम की इंतहा क्या है?
दहर से क्यों खफ़ा रहें,

चर्ख का क्यों गिला करें,
सारा जहाँ अदू सही,

आओ मुकाबिला करें।
कोई दम का मेहमान हूँ,

ए-अहले-महफ़िल,
चरागे सहर हूँ,

बुझा चाहता हूँ।
मेरी हवाओं में रहेगी,

ख़यालों की बिजली,
यह मुश्त-ए-ख़ाक है फ़ानी,

रहे रहे न रहे।
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भगत सिंह ( मार्च १९३१)

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